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दो रोटी की तलाश में घर से निकला बेटा... चार महीने बाद लौटी सिर्फ उसकी लाश

Category: गया | Date: 09 Jul 2026 | 👁️ Views: 25

सुबह का वह दिन शायद आज भी नीतीश कुमार की मां की आंखों में ताजा होगा। बेटे ने घर से निकलते समय कहा था—"मां, इस बार कमाकर लौटूंगा तो घर की हालत बदल दूंगा। छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई भी नहीं रुकेगी।" मां ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा, पिता ने हिम्मत बंधाई और पूरे परिवार ने उसे उम्मीदों के साथ महाराष्ट्र के लिए विदा किया। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि चार महीने बाद उसी बेटे की मुस्कान नहीं, बल्कि उसकी मौत की खबर घर पहुंचेगी। गया जिले के बांकेबाजार प्रखंड के धेओरी बिहरगई गांव निवासी नीतीश कुमार अपने गांव के ही एक युवक के साथ रोजगार की तलाश में महाराष्ट्र गया था। वहां वह एक फैक्ट्री में पीतल और एल्युमिनियम को अलग-अलग करने का काम करता था। परिवार के मुताबिक, नीतीश मेहनती था, नशे से उसका कोई लेना-देना नहीं था। तीन भाई-बहनों में वह सबसे बड़ा था और घर की आर्थिक जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। परिजनों के अनुसार, 5 जुलाई को अचानक महाराष्ट्र से सूचना मिली कि नीतीश की मौत हो गई है। मृतक के चाचा ने आरोप लगाया कि उनके भतीजे को जहर देकर मार दिया गया। जैसे ही यह खबर गांव पहुंची, पूरे इलाके में मातम पसर गया। मां बार-बार बेहोश हो रही थी, पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे और छोटे भाई-बहन अपने बड़े भाई की तस्वीर को देखकर फूट-फूटकर रो रहे थे। यह दृश्य सिर्फ एक परिवार का नहीं था, बल्कि पूरे गांव के दर्द का दृश्य था। एक सवाल, जो हर बार उठता है... लेकिन हर बार दब जाता है नीतीश की मौत के साथ एक बार फिर वही सवाल सामने खड़ा हो गया है—क्या बिहार का गरीब मजदूर सिर्फ मरने के लिए ही दूसरे राज्यों में जाता है? हर साल गया जिले के हजारों युवक अपने गांव की गरीबी, बेरोजगारी और परिवार की जिम्मेदारियों से मजबूर होकर पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक और दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। कोई फैक्ट्री में काम करता है, कोई निर्माण स्थल पर, कोई होटल में तो कोई खेतों में मजदूरी करता है। वे अपने सपनों का बोझ कंधों पर लेकर जाते हैं। सोचते हैं कि इस बार कुछ पैसे बच जाएंगे, बहन की शादी हो जाएगी, मां का इलाज हो जाएगा, पिता का कर्ज उतर जाएगा, टूटे हुए घर की छत बन जाएगी। लेकिन कई परिवारों के हिस्से में पैसे नहीं, बल्कि बेटे का शव आता है। गया के मजदूरों की मौत... आखिर कब तक? चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ समय में गया जिले के 15 से अधिक मजदूरों की अलग-अलग राज्यों में संदिग्ध परिस्थितियों, हादसों या अन्य घटनाओं में मौत हो चुकी है। हर बार परिजन न्याय की मांग करते हैं, जांच की बात होती है, लेकिन कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। जिन घरों के चिराग बुझ जाते हैं, वहां फिर कभी पहले जैसी रोशनी नहीं लौटती। मजबूरी का नाम है पलायन बिहार का मजदूर शौक से अपना घर नहीं छोड़ता। वह मजबूरी में जाता है। उसे अपने गांव की मिट्टी, अपने खेत, अपना परिवार और अपना घर सबसे प्यारा होता है। लेकिन जब गांव में रोजगार नहीं मिलता, बच्चों की फीस भरने के पैसे नहीं होते और घर का चूल्हा जलाना मुश्किल हो जाता है, तब वह हजारों किलोमीटर दूर अनजान शहरों में काम करने निकल पड़ता है। वह अपनी खुशियां छोड़ देता है ताकि परिवार मुस्कुरा सके। वह त्योहारों पर घर नहीं आ पाता ताकि घर में राशन पहुंच सके। लेकिन जब उसी मजदूर की मौत की खबर आती है, तो सिर्फ एक इंसान नहीं मरता, बल्कि एक पूरे परिवार के सपने टूट जाते हैं। नीतीश की मौत सिर्फ एक खबर नहीं, एक आईना है नीतीश कुमार की मौत सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं है। यह उस सच्चाई का आईना है, जिसमें बिहार का गरीब मजदूर आज भी अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर दूसरे राज्यों में काम करने को मजबूर है। अब जरूरत सिर्फ इस बात की नहीं कि मौत कैसे हुई, बल्कि इस बात की भी है कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं? बाहर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा कौन सुनिश्चित करेगा? संदिग्ध मौतों की निष्पक्ष जांच कब होगी? और उन परिवारों का सहारा कौन बनेगा, जिनके घर का कमाने वाला हमेशा के लिए चला गया? क्योंकि... दो रोटी कमाने निकला हर मजदूर सिर्फ मजदूर नहीं होता, वह अपने पूरे परिवार की उम्मीद, हिम्मत और भविष्य होता है। उसकी मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि कई सपनों का अंत होती है।

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